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MOTIONS in Indian Parliament Session

MOTIONS in Indian Parliament Session

संसद में विभिन्न प्रस्ताव

संसद में मामला उठाने की प्रक्रिया (Procedure to raise matters in Parliament)

आधे घंटे की चर्चा को छोड़कर संसद में किसी प्रश्न को पूछकर उसका उत्तर पाने में कम से कम 10 दिन का समय लगता है, जिस कारण किसी अविलंबनीय या सार्वजनिक महत्त्व के मामलों को उठाने की प्रक्रिया के संबंध में संसद के दोनों सदनों की प्रक्रिया तथा संचालन के नियमों में मामलों को उठाने की प्रक्रिया विहित की गई है। जिन प्रक्रियाओं के तहत् संसद में मामला उठाया जाता है, उन्हें प्रस्ताव (Motion) कहते हैं। प्रस्ताव सदन के किसी सदस्य द्वारा सदन के राय अथवा निर्णय को जानने का प्रस्ताव (Proposal) है। वह व्यक्ति जो प्रस्ताव का निर्माण (विशेषाधिकार प्रस्ताव के अतिरिक्त) करता है, प्रस्तावकर्त्ता कहलाता है, और सबसे पहले उसे सदन में बोलने के लिए अधिकृत होने हेतु अध्यक्ष द्वारा मान्यता मिलनी आवश्यक है। उल्लेखनीय है कि यही प्रक्रिया ‘सदन को प्राप्त करना’ (Obtaining the Floor) के रूप में जानी जाती है। प्रस्तावकर्त्ता द्वारा फ्लोर को आबटेन करने के बाद, वह प्रस्ताव के बारे में कुछ कहता है। संसद में मामला उठाने की प्रक्रिया से संबंधित प्रस्ताव निम्नवत् हैं-

1. विशेषाधिकार प्रस्ताव (Privilege Motion)

यह प्रस्ताव विपक्ष द्वारा सदन में तब प्रस्तुत किया जाता है, जब एक मंत्री सदन को गलत सूचना देकर गुमराह करता है। भारतीय विधायकों (Indian Legislatures) के सदस्य, चाहे भारत की संघीय संसद हो अथवा राज्यों व संघ शासित क्षेत्रों में विधान सभा एवं विधान परिषद् हो, अध्यक्ष की सहमति से किसी सदस्य द्वारा, किसी परिषद् द्वारा अथवा किसी समिति द्वारा विशेषाधिकार की अवहेलना (Breach of Privilege) से संबंधित प्रश्नों को उठा सकता है।

2. निंदा प्रस्ताव (Censure Motion)

यह प्रस्ताव केवल लोकसभा में सदन के विपक्षी दल द्वारा लाया जा सकता है। इसे सत्तासीन सरकार (Ruling Government) अथवा किसी मंत्री के खिलाफ काम करने में असफल रहने (Failure to Act) अथवा अपनी नीतियों की असहमतियों के संदर्भ में लाया जा सकता है। इस प्रस्ताव का एक जरूरी पक्ष यही होता है कि प्रस्ताव को लाये जाने के कारणों को स्पष्ट किया जाय।

यदि निंदा प्रस्ताव पारित हो जाता है तो मंत्रिपरिषद् को यथाशीघ्र लोकसभा का विश्वास प्राप्त करना बाध्यतामूलक हो जायेगा। उल्लेखनीय है कि भारत के संसदीय लोकतंत्र (Parliamentary Democracy) में विश्वास मत की प्रथा 1979 में शुरू हुई थी। ऐसा उस समय हुआ जब जनता पार्टी के विभाजन के बाद चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री बने। आवश्यक बहुमत (Required Majority) न होने की स्थिति में चरण सिंह ने विश्वास मत हासिल करने के स्थान पर त्यागपत्र देने को वरीयता दी।

ध्यातव्य है कि 1952 से 1977 तक जनादेश (People Mandate) इतना निर्णायक प्राप्त होता था कि विश्वास मत की आवश्यकता नहीं पड़ी। दिसंबर, 1989 में प्रधानमंत्री बनने के बाद विश्वनाथ प्रताप सिंह ने विश्वास मत प्रस्तुत किया था। वी.पी. सिंह के बाद प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने 1990 में विश्वास मत हासिल किया था। प्रधानमंत्री एच.डी. देवगौड़ा ने जून, 1996 में विश्वास मत हासिल किया, लेकिन बहुमत का समर्थन गँवाने के बाद उन्होंने त्यागपत्र दे दिया। इसी प्रकार प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने 1996 में विश्वास मत पर मतदान से पहले ही सदन में पर्याप्त संख्या बल नहीं होने की बात स्वीकार कर ली और लोकसभा में ही अपने त्यागपत्र की घोषणा कर दी।

3. अविश्वास प्रस्ताव (No Confidence Motion)

यह प्रस्ताव भी सदन के विपक्ष द्वारा केवल लोकसभा में ही लाया जा सकता है। यह प्रस्ताव केवल मंत्रिपरिषद् के खिलाफ ही लाया जा सकता है, किसी मंत्री विशेष के खिलाफ (Against any Individual Minister) नहीं लाया जा सकता। निंदा प्रस्ताव से भिन्न, एक अविश्वास प्रस्ताव हेतु किसी विशेष आधार (Specific Ground) की जरूरत नहीं होती। एक बार सदन में प्रस्तुत/पेश (Admnitted) किये जाने के बाद यह सदन की सभी लंबित कार्यवाहियों पर प्रमुखता (Precedence) धारण कर लेता है। सामान्यतया सदस्यों के बोले जाने के पश्चात् प्रधानमंत्री दोषारोपणों (Allegations) के संदर्भ में उत्तर देता है। यह सदन के द्वारा इस प्रस्ताव को अपनाया जाता है तो मंत्रिपरिषद् त्यागपत्र देने के लिए बाध्य हो जायेगी।

4. ध्यानाकर्षण प्रस्ताव (Call-attention Motion)

ध्यानाकर्षण प्रस्ताव के माध्यम से सदन कोई सदस्य अध्यक्ष/सभापति की अनुमति से अविलंबनीय लोक महत्त्व के किसी मामले की ओर किसी मंत्री का ध्यान आकर्षित करता है कि वह इस मामले पर एक संक्षिप्त वक्तव्य दें। ध्यातव्य है कि मंत्री ऐसे प्रस्ताव पर या तो तुरन्त वक्तव्य दे सकता है या किसी अन्य तिथि को वक्तव्य देने के लिए समय की मांग कर सकता है।

इस प्रस्ताव का मुख्य स्रोत दैनिक समाचार पत्र (Daily News Papers) होते हैं तथा कभी-कभी वे किसी सदस्य की निजी जानकारी के आधार पर या उसके अपने निर्वाचकों के साथ हुए पत्र व्यवहार के आधार पर दी जा सकती है। ध्यानाकर्षण प्रस्ताव से संबंधित नियम 1954 में बनाया गया था। यह प्रस्ताव 10 बजे लिखित रूप में दिया जाता है। राज्यसभा में ध्यानाकर्षण प्रस्ताव के उठाने का प्रावधान नहीं है, बल्कि ‘मोशन फार पेपर्स’ (Motion for Papers) नाम से जाना जाने वाला प्रस्ताव रहता है।

5. स्थगन प्रस्ताव (Adjournment Motion)

स्थगन प्रस्ताव पेश करने का भी मुख्य उद्देश्य किसी अविलंबनीय लोक महत्त्व के मामले की ओर सदन का ध्यान आकर्षित करना है। जब इस स्थगन प्रस्ताव (Adjournment Motion) को स्वीकार कर लिया जाता है, तब सदन अविलंबनीय लोक महत्त्व के निश्चित मामले पर चर्चा करने के लिए सदन का नियमित कार्य रोक देता है। इस प्रस्ताव हेतु आवश्यक शर्तें निम्नवत् हैं-

  • मामले का आधार तथ्यात्मक (Factual) हो।
  • मामले का स्वरूप निश्चित (Definite) हो।
  • मामला लोक महत्त्व (Public Importance) का हो।
  • मामले में विलंब किया जाना उचित न हो।

स्थगन प्रस्ताव (Adjournment Motion) लाने हेतु उचित विषय निम्नवत् हैं-

  • देश की राजनीतिक स्थिति (Political Situation of the Country)
  • अराजकता की स्थिति (Situation of Anarchy)
  • बेरोजगारी की गंभीर दशा (Serious Condition of Unemployment)
  • रेल दुर्घटनाएँ (Rail Accidents)
  • मिलों का बंद हो जाना (Stopping of Factories)
  • सामान्य अंतर्राष्ट्रीय स्थिति (General International Situation)

उल्लेखनीय है कि जो सदस्य स्थगन प्रस्ताव पेश करना चाहता है, उसे प्रस्ताव प्रस्तुत करने के दिन 10 बजे सुबह प्रस्ताव की सूचना अध्यक्ष/सभापति, संबंधित मंत्री तथा महासचिव को देना चाहिए।

यदि अध्यक्ष को समाधान हो जाये कि वह मामला नियमानुकूल है तो वह प्रस्ताव पेश करने की अनुमति देता है। प्रश्न काल की समाप्ति के बाद सदन की अनुमति से प्रस्ताव पेश किया जाता है और ऐसे प्रस्ताव पर विचार-विमर्श 4 बजे से लेकर 6.30 बजे तक होता है। इसे सरकार के विरुद्ध निन्दा प्रस्ताव (Censure Motion) भी कहते है।

6. कटौती प्रस्ताव (Cut Motion)

संसद में बजट की प्रक्रिया जिस एक प्रमुख स्तर से गुजरती है। वह है, लोकसभा में अनुदान की मांगों पर मतदान। इस दौरान संसद के सदस्य इन मांगों पर बहस भी करते हैं। सदस्य अनुदान मांगों पर कटौती के लिए प्रस्ताव भी ला सकते हैं। इस प्रकार के प्रस्ताव को कटौती प्रस्ताव (Cut Motion) कहा जाता है जो निम्नलिखित तीन प्रकार के होते हैं-

  1. नीति कटौती प्रस्ताव (Disapproval of Policy Cut) – इस प्रकार का कटौती प्रस्ताव मांग की नीति के प्रति असहमति (Disapproval) को प्रदर्शित करता है। इसमें कहा जाता है कि मांग की राशि 1 रुपये कर दी जाय। सदस्य कोई वैकल्पिक नीति भी पेश कर सकते हैं।
  2. आर्थिक कटौती प्रस्ताव (Economy Cut Motion) – इस प्रकार के प्रस्ताव में इस बात का उल्लेख किया जाता है कि प्रस्तावित व्यय से अर्थव्यवस्था पर प्रभाव पड़ सकता है। इसमें यह प्रस्ताव किया जाता है कि मांग की राशि को एक निश्चित सीमा तक कम किया जाय। यह या तो मांग में एकमुश्त कटौती (Lumpsum Reduction) हो सकती है या फिर पूर्ण समाप्ति या मांग की किसी मद में कटौती हो सकती है।
  3. सांकेतिक कटौती प्रस्ताव (Token Cut) – यह प्रस्ताव भारत सरकार के किसी दायित्व से संबंधित होता है। इसमें कहा जाता है कि मांग में 100 रुपये की कमी की जाय।

एक कटौती प्रस्ताव का महत्त्व इस बात में है कि-
(a) अनुदान मांगों पर चर्चा का अवसर मिलता है।
(b) उत्तरदायी सरकार के सिद्धांत को कायम रखने के लिए सरकार के कार्यकलापों की जाँच करना।

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Maha Gupta

Maha Gupta

Founder of www.examscomp.com and guiding aspirants on SSC exam affairs since 2010 when objective pattern of exams was introduced first in SSC. Also the author of the following books:

1. Maha English Grammar (for Competitive Exams)
2. Maha English Practice Sets (for Competitive Exams)